“ हाँ, मैंने देखा है! ”
प्रस्तुतकर्ता: सुमित सुथार
भूख से तड़पते हुये आज भी उन नन्ही आंखो को देखा है,
ठंड मे ठिठुरते हुये आज भी उन मासूम चेहरो को देखा है,
बिन कपड़ो के नंगे बदन यूं गुमते हुये उन्हे देखा है,
व्यर्थ चीज़ों की तलाश मे यूं अपने बचपन को खोते हुये उन्हे देखा है,
झूठन की तलाश मे दर बदर भटकते हुये उन्हे देखा है,
पैसो की तलाश मे यूं अपने आप को खोते हुये उन्हे देखा है,
मौत से बचने के लिए एक कपड़े की तलाश मे भटकते हुये उन्हे देखा है,
आज भी उन मासूम आंखो मे अपने कल को ढूंढते हुये उन्हे देखा है,
अपनी खुशियो की खातिर अपने स्वाभिमान को बिकते हुये देखा है।
ना आज की परवाह ना कल की चिंता है,
फिर भी मुसकुराते हुये उन्हे देखा है,
ना शिक्षा न स्वास्थ्य ना घर है,
फिर भी अपनी किस्मत पर हँसते हुये उन्हे देखा है,
न मोबाइल ना गाड़ी ना कोई सुविधा है,
फिर भी उन टूटे फूटे खिलोनों से खेलते हुए उन्हे देखा है,
ना धर्म ना जात-पात के बंधनो मे जकड़े है,
फिर भी अपने जीवन को जी ते हुये उन्हे देखा है,
क्या है पोलियो ?, क्या है कुपोषण ?,
फिर भी जेसे-तैसे जीवन जी ते उन्हे देखा है,
सर्दी, गर्मी, बारिश की कोई फिक्र नही है,
फिर भी उम्र के पहाड़ को पार करते हुये उन्हे देखा है,
दर बदर अपनी प्रतिभा को दिखाते हुये उन्हे देखा है,
उनके सपनों को सिर्फ सपना बनते हुये देखा है,
मजबूरीया होते हुये भी जीवन की हर परीक्षा पास करते हुये उन्हे देखा है,
इंसान होते हुए भी, उन्हे अछूत मानते हुये देखा है |
भूख से तड़पते हुये आज भी उन नन्ही आंखो को देखा है,
ठंड मे ठिठुरते हुये आज भी उन मासूम चेहरो को देखा है |
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